प्रेमचंद के उपन्यासों में पर्वतीय जीवन की कठिनाइयों का चित्रण

प्रेमचंद के उपन्यासों में पर्वतीय जीवन की कठिनाइयों का चित्रण

प्रेमचंद जयंती विशेष: 

कथाकार प्रेमचंद के उपन्यासों में पर्वतीय जीवन की कठिनाइयों का चित्रण

31 जुलाई 1880 को लमही (बनारस) में जन्मे प्रेमचंद ने अपने 56 वर्ष के जीवनकाल में 15 उपन्यासों तथा 301 कहानियों की रचना की। प्रेमचंद का उपन्यास रचना संसार असरारे मआबिद उर्फ देवस्थान रहस्य (1903-05) से शुरू होकर मंगलसूत्र ( अपूर्ण,1948 ) पर समाप्त होता है। इस बीच उनके प्रेमा ( 1907),रुठी रानी (1907), वरदान (1912),सेवासदन (1918), प्रेमाश्रम(1921),रंगभूमि(1925),कायाकल्प (1926), निर्मला(1926), प्रतिज्ञा(1927), गबन(1931),कर्मभूमि (1932), और गोदान(1936) उपन्यास प्रकाशित हुए।

प्रेमचंद मूलत: ग्रामीण जन जीवन के कथाकार थे। इनके उपन्यासों में ग्रामीण समाज और संस्कृति का विशद वर्णन हुआ है, यही कारण है कि इनके उपन्यासों में पहाड़ी जन-जीवन को भी चित्रित होने का अवसर मिला है। पर्वतीय जन-जीवन की विविध समस्याओं और कठिनाइयों का निरूपण इनके उपन्यासों में हुआ है। विशेषकर इनके गबन, कर्मभूमि और गबन उपन्यासों में पर्वतीय जीवन का चित्रण देखते ही बनता है।

इनके गबन उपन्यास में रमानाथ देवीदीन को बदरीनाथ के विषय में बताता है कि वहाँ पहाड़ों की बड़ी-बड़ी चढ़ाइयाँ हैं-” रमानाथ ने आश्चर्य से पूछा: ” तुम बदरीनाथ की यात्रा कर आये? वहाँ तो पहाड़ों की बढ़ी-बढ़ी चढ़ाइयाँ हैं।” रमानाथ का यह कथन पहाड़ों में आने वाली मार्ग बाधा की तरफ संकेत करता है।

इनके कर्मभूमि उपन्यास में उत्तर की पर्वत-श्रेणियों के बीच स्थित पहाड़ी गाँव के जन-जीवन की कठिनाइयों का सुन्दर चित्रण हुआ है। सलोनी काकी के अभावग्रस्त और संघर्षपूर्ण जीवन की झलक देखिए-“अमरकांत ने झोंपड़ी में आकर देखा तो बुढ़िया चूल्हा जला रही थी। गीली लकड़ी ,आग न जलती थी। पोपले मुँह में फूँक न थी। अमर को देखकर बोली : तुम यहाँ धुएँ में कहाँ आ गये बेटा, जाकर बाहर बैठो। यह चटाई उठा ले जाओ।” पर्वतीय निवासियों के अभावग्रस्त जीवन को चित्रित करता एक उदाहरण और नीचे दिया जा रहा है-“उसने थाली धो-धाकर रख दी और दरी बिछाकर जमीन पर लेटने ही जा रहा था कि पंद्रह- बीस लड़कों का एक दल आकर खड़ा हो गया । दो- तीन लड़कों के सिवा और किसी की देह पर साबुत कपड़े न थे।” इसी गाँव का निवासी पयाग कृषक-जीवन की समस्याओं का उल्लेख करते हुए कहता है-” खेती की झंझट में न पड़ना भैया। चाहे खेत में कुछ हो या न हो,लगान जरूर दो। कभी ओला-पाला,कभी सूखा-बूड़ा। एक-न-एक बला सिर पर सवार रहती है। उस पर कहीं बैल मर गया या खलिहान में आग लग गयी,तो सब कुछ स्वाहा।”

इस प्रकार कर्मभूमि में पर्वतीय ग्रामीणों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समस्याओं का यथार्थपरक चित्रण हुआ है।

प्रेमचंद के गोदान उपन्यास में बी.मेहता, मालती, रायसाहब, खन्ना , मि. तंखा और मिर्जा खुर्शेद के भ्रमण स्थल ‘पहाड़ी प्रांत’ की कठिनाइयों का चित्रण हुआ है। इस पहाड़ी प्रांत का रास्ता इतना जटिल और दुष्कर होता है कि मालती थककर बैठ जाती है-“दोनों कुछ दूर चलते रहे। एक तो जेठ की धूप,दूसरा पथरीला रास्ता।मालती थककर बैठ गई।” पहाड़ी प्रदेशों में भयंकर जंगली जानवरों के आक्रमण का भय बना रहता है। इस कहानी में आदिवासी युवती मेहता को बताती है कि उनकी गैया को एक बार तेंदुए ने घेरा था।

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रेमचंद के उपन्यासों में पर्वतीय जीवन की आवागमन,कृषि, असुविधाजनक जीवन-शैली और जंगली जीवों के आतंक आदि कठिनाइयों का चित्रण हुआ है। यद्यपि प्रेमचंद आजादी से पूर्व के कथाकार हैं,तथापि उनके द्वारा चित्रित उपर्युक्त समस्याएँ आज भी पर्वतीय जन- जीवन में ज्यों की त्यों व्याप्त हैं। पर्वतीय क्षेत्र आज भी विकास की बाट जोह रहे हैं। पर्वतीय प्रदेशों में बाघ, भालू , सुंअर और बंदरों के आतंक की समस्या भी किसी से छिपी नहीं है। प्रेमचंद की यही खूबी उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है।

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